मुख्य पेज
नव उन्नयन साहित्यिक सोसाइटी



‘नव उन्नयन साहित्यिक सोसाइटी‘ हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं, साहित्य, संस्कृति, शोध और अनुवाद आदि के उन्नयन हेतु गठित एक स्वैच्छिक संस्था है।
- वर्ष 2006 में गठित एवं 2008 में पंजीकृत यह संस्था देश-विदेश के विश्वविद्यालय, साहित्यकारों, शिक्षकों तथा हिंदी सेवियों को मंच प्रदान करने हेतु संकल्पबद्ध है।
संस्था के मुख्य लक्ष्य और उद्देश्य
सहृदय (पंजीकृत) त्रैमासिक शोध-पत्रिका का प्रकाशन।
- मौलिक तथा अनूदित पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओ से संपन्न संदर्भ पुस्तकालय की स्थापना।
- साहित्यिक विमर्श –गोष्ठी, व्याख्यान एवं कार्यशाला आदि का आयोजन।
- अखिल भारतीय स्तर पर भाषा, साहित्य पत्रकारिता अनुवाद के शिक्षण-प्रशिक्षण की योजनाएँ।
- विदेशों में भारतीय भाषाओं, साहित्य-संस्कृति आदि से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं से संपर्क, संवाद एवं सहयोग।
- भारतीय प्रवासी लेखन के प्रचार-प्रसार में रचनात्मक सहयोग।
- भाषा प्रबंधन एवं भाषा प्रौद्योगिकी के विकास को प्रोत्साहन ।
मानक ग्रंथो का लेखन, संपादन, अनुवाद एवं प्रकाशन।
उपर्युक्त क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाले लेखकों-विद्वानों को सम्मानित-पुरस्कृत करना।
वर्तमान समय में मीडिया, मिशन, प्रोफेशन, सेंसेशन से कमीशन तक के इस दौर में पत्र-पत्रिकाओं की गरिमा, मर्यादा और नीतियां प्रभावित हुई हैं। नव उन्नयन साहित्य सोसायटी द्वारा साहित्य की सृजनशीलता, मौलिकता एवं सहृदयता को जीवंत बनाए रखने के लिए ‘सहृदय पत्रिका’ का संपादन किया गया। ‘यथा नाम तथा गुण’ के अनुसार 2009 से अपने नाम को सार्थक करते हुए, अब तक साहित्य और पत्रकारिता जगत में अपना वर्चस्व बनाए हुए है। चकाचौंध लेखन की होड़ और पुरस्कारों की दौड़ में पहला स्थान पाने के जोश ने जो वातावरण बनाया, उससे सभी सुपरिचित हैं। सहृदयता मानो पुरातत्व या अलभ्य- सी हो गई है। हिंदी के लेखन और लेखक की वैचारिक संकीर्णता, कट्टरता, खेमेबाजी और बिरादराना भाव का अभाव यहां हमे दिखाई पड़ता है। वैचारिक संकीर्णता को पाटने का प्रयास यह पत्रिका करती है। ‘सहृदय’ के द्वारा साहित्य के स्व, स्वराज, रचनाधर्मिता, पाठकीय संवेदना और सहृदयता के संरक्षण का प्रयास किया गया । साहित्य जगत, लेखन जगत और जीवन में कमजोर पड़ते सहृदय तत्व को बूंद-बूंद कर इकठ्ठा करने और सामूहिकता के आह्लादकारी अनुभव को लोगों तक सहजता से पहुंचाने का प्रयास इस पत्रिका के माध्यम से किया गया है। कहा भी गया है कि संवेदना की दुनिया में दीवारें नहीं होती, दर हैं और खासी ऊंची भी हैं। साथ ही अनुदारता, अपरिचय, असहयोग और आत्ममुग्धता की आबोहवा में ये दीवार अभेद्यता की ओर उन्मुख सम्मिलित प्रयास हैं। बिना किसी गगनगुंजित-नारे, सलोने-स्लोगन या कैचिंग-पंचलाइट की जड़ता के खिलाफ परिवर्तन स्वप्न है। सहृदय साख वाली साहित्यिक पत्रकारिता की वाहक बने रहने का प्रयास सार्थक रहा है। पत्रकारिता की अंधी दौड़ में शामिल होने का कोई लक्ष्य नहीं है। दावा तो बस पत्रकारिता की गरिमा को बनाए रखने का है । हमारा कोई शेष या विशेष, व्यक्ति या विचार के प्रति आग्रह या दुराग्रह नही है। विचारों और रचनाओं का स्वागत स्वीकार पत्रिका की प्राथमिकता रही है।
नव उन्नयन साहित्यक-सोसाइटी के 10 वर्ष पूरे होने पर वर्ष 2018 में दशकीय यात्रा के रूप में स्मारिका का लोकार्पण किया गया, जिसके संपादक प्रो. पूरनचंद टंडन और सह-संपादक डॉ. विनीता कुमारी हैं। इस संस्था द्वारा तय की गई दस वर्षों की गतिविधियों का ब्यौरा स्मारिका में रखा गया। दस वर्षीय यात्रा को समेटने का प्रयास सरल नही था, परंतु शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों के सहयोग से ये कार्य संपन्न हुआ। स्मारिका को पठनीय एवं सरंक्षणीय बनाने के लिए शोध के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय में वर्ष 1952 से 2018 तक हो चुके शोधकार्य की सूची प्रकाशित की गई। ‘सहृदय’ पत्रिका के प्रकाशित अंकों की सामाग्री भी विषय के अनुसार वर्गीकृत सूची स्मारिका में दी गई, जिससे पत्रिका में प्रकाशित लेखक, संपादक तथा अन्य सामग्री की जानकारी आसानी से प्राप्त हो सके।
नव उन्नयन साहित्यिक सोसाइटी के कार्यकारणी सदस्य
